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Bhai Ne Biraj Ki Mor (Hindi Paperback August, 2025)

Original price was: ₹ 350.00.Current price is: ₹ 200.00.

Book Detail

AuthorPremlata Upadhaya
Pages252
Book FormatPaperback
ISBN 13978-81-991400-7-3
Dimensions21.7 x 14.5 x 2.5 cm
Item weight300 gm
LanguageHindi
Publishing YearSeptember, 2025
Book GenreReligion
PublisherBright MP Publisher
SellerBuks Kart “Online Book Store”
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Description

“भई ने बिरज की मोर” बुंदेलखंड की कार्तिक स्नान परंपरा का पालन करती एक गोपिका की अभिलाषा है जो उसकी आत्मा को आलोकित करती है। तेईस वर्षों से लगातार कार्तिक स्नान कर इन परंपराओं का निर्वाह करते हुए मन में एक हुलास जगी की क्यों न इस परंपरा को शब्द रूप देकर इन अद्भुत भावनाओं का संकलन किया जाए। मस्तिष्क में लौ जगी तो ठाकुर जी की कृपा भी बरसने लगी और मैं इस परंपरा से जुड़े तथ्यों को सहेज कर अपनी मन मंजूषा में तह कर करके रखने लगी। विभिन्न स्रोतों से कभी नदी तालाबों के घाट पर नहाती सखियों के साथ, कभी मंदिर में पालने में झूला झुलाकर, कभी खो गए कृष्ण को ढूंढतीं गोपियों के साथ भटककर, कभी मीना बाजार लुटातीं सखियों के साथ, कभी सिर पर लोटा और भगवान रखें गलियों में कार्तिक गीत गाती सखियों के साथ, कार्तिक की किसा साथ-साथ सुनती सुनाती सखियों के साथ, तुलसी के गीत गाते अतकारियों के साथ, गोवर्धन की परिक्रमा करतीं, दीपदान करतीं सखियों के साथ, पूरे महीने दो दल और बीज वाली चीजों को छोड़कर एक माह तक व्रत करती कतकारियों के साथ, पचभीखों का व्रत-पूजन करती नारियों के साथ, संयम, जप-तप, ब्रह्मचर्य, आहार-विहार निषेध का कड़ाई से पालन करती गोपिकाओं के साथ निरंतर पूरे कार्तिक मास के संसर्ग और विगत कई वर्षों के संग-साथ से जो कुछ सहेजा वह इस ग्रंथ के रूप में साकार हुआ। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा बहुत प्राचीन है और इसमें लोक कथा, लोकगीत, लोक परंपराएं वाचिक परंपराएं हैं। इनका कोई ज्ञात लेखक नहीं है यह श्रुति के अनुसार अपना थोड़ा-थोड़ा रूप बदलते हुए संपूर्ण समाज की हो गई हैं और आज यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

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